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Petrol Diesel Price: गाड़ी की टंकी फुल करवा लें! अगले 7 दिनों में ₹120 पार जा सकता है पेट्रोल; रिपोर्ट में हुआ खुलासा

पेट्रोल–डीजल की कीमतें 29 अप्रैल के विधानसभा चुनावों के बाद भारी बढ़ सकती हैं। कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की रिपोर्ट के अनुसार दाम 25–28 रुपये प्रति लीटर तक उछाल सकते हैं, जिससे 94–96 रुपये वाला पेट्रोल 120 रुपये के पार जा सकता है। आम आदमी पर महंगाई का बोझ सीधा पड़ेगा।

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petrol diesel price hike after election

देश में पेट्रोल‑डीजल की कीमतें हाल के हफ्तों में स्थिर रहने के बावजूद अगले हफ्ते के बाद एक बड़े झटके की चपेट में आ सकती हैं। एक्सपर्ट रिपोर्ट्स के मुताबिक, 29 अप्रैल को विधानसभा चुनावों का आखिरी चरण खत्म होते ही सरकारी तेल कंपनियां पेट्रोल‑डीजल के दामों में भारी उछाल लगा सकती हैं। ब्रोकरेज फर्म कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज की हालिया रिपोर्ट के अनुसार पेट्रोल और डीजल की कीमतें 25 से 28 रुपये प्रति लीटर तक ऊपर उठ सकती हैं, जिसका मतलब है कि अभी 94- 96 रुपये लीटर वाला पेट्रोल 120 रुपये के पार भी जा सकता है। यह दाम भारत में अब तक की सबसे ऊंची कीमत होगी, अगर यह सीनारियो सामने आया तो।

विधानसभा चुनावों के बाद क्यों बदलेगी तस्वीर?

कोटक की रिपोर्ट के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का भाव 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर चल रहा है, जबकि भारत में पेट्रोल‑डीजल के खुदरा दाम इस उचाई के अनुरूप नहीं बढ़े हैं। इसका सीधा असर सरकारी तेल कंपनियों के वित्त पर पड़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, इन कंपनियों को हर महीने करीब 27,000 करोड़ रुपये का घाटा हो रहा है, क्योंकि वे ऊंची लागत पर आयात किया जाने वाला तेल सस्ते में बेचने को मजबूर हैं। यह घाटा लंबे समय तक चलता रहा तो कंपनियों की वित्तीय कमर टूट सकती है, जिससे रिफाइनरी ऑपरेशन, आयात योजना और घरेलू सप्लाई तक प्रभावित हो सकते हैं।

सरकार ने इस दबाव को कम करने के लिए कुछ राहत कदम उठाए हैं, जैसे एक्साइज ड्यूटी में प्रति लीटर 10 रुपये की कटौती और रिफाइनरी एक्सपोर्ट पर लगाया गया विंडफॉल प्रॉफिट टैक्स। लेकिन ये उपाय रिपोर्ट की भाषा में “ऊंट के मुंह में जीरे” जैसे हैं। बुनियादी समस्या यह है कि कच्चे तेल की लागत और पेट्रोल‑डीजल के खुदरा भाव के बीच की खाई अभी भी विस्तृत और गहरी है, जिसे केवल थोड़ी टैक्स राहत से पाटा नहीं जा सकता।

होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से पैदा हुआ सप्लाई संकट

कच्चे तेल की कीमतें और पेट्रोल‑डीजल के बिक्री भाव के बीच यह विस्तृत अंतर मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव से जुड़ा हुआ है। वहां की जियो‑पॉलिटिकल स्थिति ने होर्मुज स्ट्रेट को काफी हिस्से के लिए बंद कर दिया है, जिससे क्रूड ऑयल की आपूर्ति बुरी तरह बाधित हो गई है। ईरान ने सीजफायर के दौरान थोड़ी राहत दी थी, लेकिन माहौल फिर से बिगड़ गया है, तेल टैंकरों के लिए सुरक्षित मार्ग तय करना मुश्किल हो गया है। इसकी वजह से बाजार में उथल‑पुथल बनी हुई है और कच्चे तेल के भाव 120 डॉलर तक पहुंचने की चर्चा सामने आ रही है।

भारत 85% तेल आयाती है, और इसका बड़ा हिस्सा होर्मुज स्ट्रेट से गुजरता है, इसलिए जब यह जलमार्ग बंद होता है तो सीधे तौर पर भारतीय तेल कंपनियों की लागत बढ़ती है।

वायदा भाव और हाजिर भाव के बीच बढ़ता फर्क

कोटक की रिपोर्ट एक और चिंताजनक संकेत देती है: कच्चे तेल के वायदा भाव (फ्यूचर प्राइस) और वास्तविक भाव (स्पॉट प्राइस) के बीच का अंतर लगातार बढ़ रहा है। यह आमतौर पर तब होता है जब बाजार को यह भरोसा नहीं होता कि सप्लाई जल्दी बहाल हो जाएगी। बड़ा स्प्रेड दर्शाता है कि लोगों को लग रहा है कि जल्दी राहत नहीं मिलेगी और सप्लाई दबाव बना रहेगा। इसका मतलब यह है कि अगले कुछ हफ्तों-महीनों तक तेल के भाव ऊंचे रहने की संभावना ज्यादा है, जिससे पेट्रोल‑डीजल की होलसेल लागत भी ऊपर चढ़ती रहेगी।

भारत पर इसका असर साफ दिख रहा है। मार्च-अप्रैल की अवधि में तेल के आयात में 13-15% की गिरावट के बावजूद, रोज का आयात बिल 190 से 210 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यानी कम तेल खरीदकर भी देश को ज्यादा डॉलर खर्च करने पड़ रहे है।

आम आदमी पर क्या असर पड़ेगा?

अगर पेट्रोल‑डीजल की कीमतें वास्तव में 25-28 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ती हैं, तो इसका सबसे ज्यादा असर आम आदमी के रोजमर्रा की जेब पर पड़ेगा। ट्रांसपोर्ट की लागत बढ़ती है, तो ट्रक वालों को अधिक भाड़ा मांगना पड़ता है, जिससे सब्जी‑फल, दाल, चावल और अन्य सामान महंगे हो जाते हैं। डिलीवरी चार्ज बढ़ते हैं और ऑनलाइन किराया, टैक्सी, ऑटो, रिक्शा सभी के भाव ऊपर उठते हैं। परिणामस्वरूप पूरी अर्थव्यवस्था में उत्पाद और सेवाओं की कीमतें चढ़ती हैं, यानी महंगाई की दर फिर से दबाव में आ सकती है।

रिपोर्ट के अनुसार, यह बढ़ोतरी एक झटके में नहीं, बल्कि कई चरणों में धीरे‑धीरे हो सकती है। सरकार और तेल कंपनियां महंगाई की चिंता को देखते हुए ऐसा ही कदम उठा सकती हैं, ताकि राजनीतिक और जनता की प्रतिक्रिया नियंत्रित रहे। लेकिन हकीकत यह है कि चाहे दाम धीरे‑धीरे ही क्यों न बढ़ें, अंततः यह बोझ आम उपभोक्ता को उठाना ही पड़ेगा। इस दृष्टि से “अगले 7 दिनों में टंकी फुल कर लें” जैसी चर्चा, भले ही थोड़ा अतिशयोक्तिपूर्ण लगे, निवेश और उपभोक्ता व्यवहार को लेकर एक तरह की आगाही की तरह काम कर रही है।

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